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हमारी मूर्खता नापने के बैरोमीटर

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© जयराम शुक्ल

संपर्क सूत्र : 8225812813
email:jairamshuklarewa@gmail.com



क्या आपको मालूम है कि हमारी मूर्खता नापने का भी कोई पैमाना है? क्या ऐसा नहीं लगता कि हर अतरे-दूसरे साल ऊटपटांग की अफवाहें फैलाकर कोई गिरोह या संगठन आम भारतीय जनमानस का लिटमस टेस्ट करता है? अब ..चोटीकटवा..को ही ले लीजिये। मीडिया इससे जुड़ी अफवाहों का खंडन करने की बजाए मंडन कर रहा है। खासकर कुछ चैनल्स। इनके लिए तो ऐसे मसाले हमेशा से टीआरपी ट्रेन्ड सेंटर रहे हैं। तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, इन्द्रजाल, डायन, सच्ची खबरें कड़वे घूट ये सब कुछ तो पहले से ही परोस रहे हैं पर कोई अफवाह कैसे जरूरी मुद्दों को धकियाकर प्राइम टाइम हड़प लेती है इससे अच्छा उदाहरण और कहां मिलेगा। मुझे ऐसे मौके पर प्रो.यशपाल शिद्दत से याद आ रहे हैं। कोई पंद्रह साल पहले इसी तरह गणेश जी के दूध पीने की अफवाह उड़ी थी।

टीवी चैनल न सिर्फ भारत में इस भेडियाधसान कृत्य की खबरों को चाव से प्रस्तुत कर रहे थे वरन् अमेरिका के सिलीकान वैली में भी भारतीयों के गणेश जी दूध पी रहे हैं दिखा रहे थे। ऐसे में प्रो.यशपाल ने हस्तक्षेप किया और ऑन स्क्रीन यह दिखाया कि यह पृष्ठतनाव (सरफेसटेंशन) की वजह से होता है। इसके बाद अन्य वैज्ञानिकों ने भी मोर्चा सँभाला और दो तीन दिन में सब साफ हो गया। उस अफवाह में भी कई विवेकवान लोग झांसे में आ गए थे जिनमें राजनेता और सेलेब्रिटीज भी थे। कुछ साल पहले ..मुँहनोचवा..की अफवाह उड़ी थी, एक भी वास्तविक घटना सामने नहीं आई पर अफवाहों का दौर कोई महीने चला। आपको याद होगा कि इसी अफवाह के बाद लड़कियों ने मुँह बाधना शुरू कर दिया था कि कोई अज्ञात, अदृश्य ताकत उनका मुँह नोच के कुरूप न बना दे। अफवाह आई गई, पर मुँह बाँधने के चलन ने उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक इतना जोर पकड़ा कि अब लड़की हो या लड़का सभी मुँह बाँधे दिखते हैं। परिणाम यह निकला कि मुँह बाँधने के डिजाइन्ड दुपट्टों व रूमालों को बनाने व बेचने की हजारों करोड़ की इंडस्ट्री खड़ी हो गई। सरेआम नकाबपोशी फैशन बन गई। ये नकाबपोश कानून व्यवस्था के लिए भी चुनौती बने हुए हैं। पुलिस इसलिये कुछ नहीं कर पाती क्योंकि इससे निजता के मौलिक अधिकार का हनन होता है।

ऐसी अफवाहें अपने पीछे कुछ न कुछ उद्देश्य लेकर चलती हैं। मैं जो समझता हूँ इसके पीछे कोई ऐसा गिरोह या संगठन काम करता है जो समय समय पर भारतीय जनमानस का परीक्षण करता है कि उसे अफवाह की रौ मे कितना बहाया जा सकता है। इससे इस बात का भी पता चलता है कि अभी भी हम भारतीय कितने मूर्ख, जाहिल और अंधविश्वासी हैं जो ऐसी खबरों के झांसे में आ जाते हैं। ऐसी अफवाहें भारतीय मीडिया की गंभीरता की थाह भी लेती रहती हैं। चोटीकटवा.. की खबरों को जिस तरह से चैनलों ने मिर्च-मसाले के साथ पेश किया है वह ये दर्शाता है कि यह कितना स्तरहीन, उथला और झूठा है। इस तरह की प्रमाणित धारणा हमारे मीडिया की पोल खोलती भी है और ऐसा सूत्र पकड़ाती है कि किसी न्यस्त स्वार्थ को पूरा करने के लिए इसका किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

सन् 82 में देश में टेलीविजन का विस्तार हुआ। जल्दी ही यह रंगीन हो गया। सन् 90 के बाद निजी चैनलों का फैलाव शुरू हुआ। तब मीडिया का विद्यार्थी होने के नाते दुनिया भर के टेलीविजन चैनलों के प्रभाव का सरसरी तौर पर अध्यन किया था। एक अमेरिकी मीडिया विशेषज्ञ ने शानदार उदाहरण के साथ बताया था कि भारत में यह नया दृश्य श्रव्य माध्यम बंदरों के हाथ में उस्तरे जैसा है। मीडिया में अपसंस्कृति और मिथ्या सूचनाओं के घालमेल और स्वीकार्यता के संदर्भ में उन्होंने लिखा… खौलते पानी में मेढक को डालेंगें तो वह उछलकर बाहर आ जाएगा, लेकिन ठंडे पानी से भरे पतीले को तैरते हुए मेढक के साथ मंद आँच में रखेंगे तो मेढक पक जाएगा क्योंकि उसको खतरे का अहसास तक नहीं हो पाएगा कि पकने के पहले छलांग लगा सके..।

अपसंस्कृति इसी तरह आहिस्ता आहिस्ता अपनी पैठ बनाती है और हमें पता ही नहीं चल पाता। भारतीय मीडिया खासकर टीवी को भोथरा कौशल संचालित कर रहा है। इसी का फल है कि देश के तमाम मुद्दों को दरकिनार कर..चोटीकटवा.. जैसी बेवकूफाना खबरें दिन भर चलाता है। चीन एक गंभीर मसला है पर उससे जुड़ी खबरें ओझल होती जा रही हैं। यूएनओ में अजहर मसूद के पक्ष में उसने फिर से वीटो लगा दिया। ऐसे जैसे कई वैश्विक व घरेलू मसले हैं जो ..चोटीकटवा..के पीछे हो गए। यह जान लीजिए अफवाह पहले विवेक को शून्य करती है फिर तर्क को मारती है इसके बाद वह आस्था और विश्वास पर सवार होकर तमाशा रचती है। यह भी सौ फीसदी सच है कि हर अफवाह के पीछे सुनिश्चित उद्देश्य होता है, कोई जल्दी तो कोई देर से फलित होने वाला।