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अगस्त क्रांति: शिष्ट आचरण पर एक सूक्ष्म दृष्टि स्वतंत्रता के 70 वर्ष

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© डॉ. जॉन चेल्लादुरै



विशेष लेख: स्वतंत्रता दिवस 2017

8 अगस्त, 1942 को पारित ‘भारत छोड़ो’ संकल्प से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ की शुरुआत हुई। गांधी जी को लगा कि सत्य और अहिंसा के आदर्श की अग्निपरीक्षा की घड़ी आ गयी है. विश्व युद्ध का दौर था। भारत पर कठोर साम्राज्यवादी शासन की तानाशाही जारी थी। धुरी राष्ट्रों से हमारी मातृभूमि पर हमले की धमकियां मिल रही थीं। ऐसे माहौल में स्वतंत्रता सेनानी एक ऐसी मानवीय रणनीति बनाने में लगे थे जिसमें हत्याओं, विनाश और विश्वासघात की कोई जगह न हो, ताकि पुरानी सभी गलतियों को सही किया जा सके। उन्होंने अपनी इस मुहिम में जीत हासिल कर न सिर्फ अपने आप को सही साबित किया बल्कि मानवता को सभ्यता का एक अनोखा पाठ भी सिखाया।

धुरी राष्ट्रों की सेनाएं पूर्वी एशिया के रण-क्षेत्रों में ब्रिटेन और मित्र राष्ट्रों को धूल चटाकर भारतीय सीमा के काफी करीब पहुंच चुकी थीं। इस बात की जबरदस्त आशंका बन गयी थी कि जापान किसी भी वक्त भारत पर हमला कर सकता है। भारतीय सीमाओं को लेकर धुरी राष्ट्रों की दिलचस्पी बुनियादी तौर पर यहां ब्रिटेन की मौजूदगी की वजह से पैदा हुई थी। अगर यहां ब्रिटेन न होता तो ऐसा माना जाता है कि धुरी राष्ट्रों की भारत को लेकर शायद ही कोई दिलचस्पी होती।

1942 के प्रारंभ में सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में आए मिशन ने भारत को जो दिया उसे गांधी जी पहले ही दिवालियेपन की ओर जा रहे बैंक द्वारा जारी मियाद-खत्म चैक करार दे चुके थे। क्रिप्स मिशन का एकमात्र मकसद भारत को ब्रिटिश सेना, खास तौर पर उसके सैनिकों को हर तरह के साजो-सामान मुहैया कराने को राजी कर युद्ध में उसका सहयोग हासिल करना था। इसके बदले में भारत को युद्ध के बाद सह-राज्य का दर्जा देने का वादा किया जा रहा था, हालांकि यह वह बहुत ही अस्पष्ट था और उसकी कोई निश्चित समय-सीमा नहीं बतायी गयी थी। इस बीच मिशन ने घोषणा कर दी कि भारत से संबंधित मामलों पर ब्रिटेन अपना पूरा नियंत्रण बनाए रखेगा। इससे भारतीय नेता अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे।

इससे तत्काल राजनीतिक कार्रवाई की आवश्यकता उत्पन्न हो गयी।मूलत: यह ब्रिटेन की लड़ाई थी जो भारत को लड़ाई का मैदान बना देना चाहता था। यह एक ऐसी मुहिम थी जिसमें उसकी हार हो रही थी और भारत के लोगों को जबरन एक ऐसे युद्ध में झोंका जा रहा था जिसका वही हश्र होना था जो पूर्व में दूसरे युद्धों में ब्रिटेन का हुआ था।आगे ब्रिटेन का साथ देने का मतलब था भारत को एक ऐसे युद्ध में घसीटा जाना जिससे उसका कोई सरोकार नहीं था। ब्रिटेन का साथ देने का एक और मतलब एक ऐसे पक्ष की तरफदारी करना भी था जिसका युद्ध में बेड़ा गर्क होना तय था और जो डूबते-डूबते भारत को भी डुबो सकता था। इतना ही नहीं, युद्ध में ब्रिटेन के साथ एकजुटता और बलिदान का पुरस्कार देश में साम्राज्यवादी दमन के जारी रहने के रूप में सामने आना भी तय था।

लेकिन यह एक ऐसा निर्णायक वक्त था जब हम क्षण भर के लिए भी हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रह सकते थे। अगर हम ब्रिटेन का साथ नहीं देते और अपने आप को युद्ध से अलग रखते तो भी फासीवादी ताकतों के हाथों ब्रिटेन की हार होने पर भारत के पतन के मूक साक्षी बनते। ऐसी स्थिति आ गयी थी कि आगे बढ़कर कुछ करना अनिवार्य लगता था। ऐसे में हमारे नेताओं ने राष्ट्रीय सम्मान की खुद रक्षा करने का रास्ता अपनाया। उन्होंने निर्णय किया कि राष्ट्र की नियति देशवासियों के अपने गुण-दोषों से होगी न कि हताश ब्रिटिश हुकूमत इसका फैसला करेगी।

हमारे नेताओं ने ब्रिटेन से ‘भारत छोड़ो’  का आह्वान किया। यह आह्वान देश की आजादी के लिए नहीं बल्कि उस खतरनाक स्थिति से देश को निजात दिलाने के लिए था जिसमें ब्रिटेन ने उसे झोंक दिया था। उन्होंने इस बात का संकल्प ले लिया कि वे भारत के चेहरे पर बंधे ब्रिटेन के उस मुखौटे को उखाड़ फैंकेंगे जिस पर फासिस्ट ताकतें हमला करने को आमादा हैं। राष्ट्रीय नेता, खास तौर पर गांधीजी एक नैतिक दुविधा में फंस गये थे। सत्याग्रह के सदाचार का तकाजा था कि विरोधी पर संकट की घड़ी में हमला न किया जाए। ऐसा करना सत्य के सिद्धांत का उल्लंघन करने जैसा था।1942 में ब्रिटेन ने हमारे सामने युद्धोन्माद जैसी स्थिति पैदा कर दी थी जिसमें ब्रिटेन का साथ देने का मतलब था हिंसा का साथ देना जिसकी परिणति हमारी अपनी तबाही में हो सकती थी। हमारे सामने सवाल था कि क्या युद्ध के मैदान में उतरा जाए अगर हां, तो क्यों न अपनी शर्तों पर ही इसे लड़ा जाए।

एक और भी दुविधा थी। क्या कोई ऐसी लड़ाई हो सकती है जिसमें भाग लेने वाला एक भी व्यक्ति हिंसक न हो गांधी जी इस विस्फोटक स्थिति को भांप गये।वे यह जान गये थे कि अगर वे सामूहिक सत्याग्रह का आह्वान करेंगे तो इसका नतीजा व्यापक हिंसा के रूप में सामने आ सकता है। इससे पहले के साल, यानी 1941 में जब बातचीत विफल हो गयी तो गांधी जी ने सत्य और अहिंसा के अपने विश्वस्त हथियारों का सहारा लिया था और घोषणा की कि इस युद्ध को वही लोग लड़ सकते हैं जो अपनी अंतरतम से अहिंसक हों और उन्होंने इसे व्यक्तिगत सत्याग्रह का नाम दिया। उन्होंने घोषणा की कि यह सत्याग्रह निर्णायक होगा। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में बंद कर दिया गया,लेकिन उन्हें युद्ध में सहयोग के बारे में बातचीत फिर से शुरू करने के बदले ब्रिटिश कैबिनेट की ओर से सद्भाव के तौर पर एक-दो महीनों बाद ही रिहा कर दिया गया।

क्रिप्स मिशन के बाद स्थिति इतनी तेजी से बिगड़ रही थी कि गांधी जी ने विदेशी ताकतों के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन छेडऩे का ऐलान कर दिया, हालांकि ऐसा करने में कुछ लोगों के सत्याग्रह के मार्ग से भटकने की आशंका भी बनी हुई थी। इस तरह गहरी हताशा के माहौल में 8 अगस्त, 1942 को बंबई में कांग्रेस के अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ का उद्घोष हुआ। गोवालिया टैंक मैदान में भारत छोड़ो प्रस्ताव पर अपने दृढ़ भाषण में गांधी जी ने इसे ‘करो या मरो’ मुहिम का नाम दिया जिसमें ‘करने’ पर जोर दिया गया।

उस समय भी गांधीजी फासीवादी ताकतों को लेकर अपने दृष्टिकोण के बारे में एकदम स्पष्ट थे। वे नहीं चाहते थे कि भारत के लोग केवल हताशा और कड़वाहट में जापानी आक्रमणकारियों का स्वागत कर अपना अपमान करें। उनके लिए यह एक नैतिक प्रश्न था-–आस्था का मुद्दा था। चाहे कुछ भी हो जाए, भारत को अपनी अपनी आत्मा को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कुछ ही दिनों के भीतर गांधीजी ओर करीब एक लाख स्वाधीनता सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया गया। कहा जाता है कि ‘करो या मरो’ के नारे के साथ गांधी जी ने देशवासियों का आह्वान करते हुए एलान किया कि अगर उन्हें जेल में कैद किया गया तो वे अनशन शुरू कर देंगे। इसे सुन कर विनोबा जी, जो स्वयं भी जेल में बंद थे, उन्होंने भी अनशन शुरू कर दिया। उन्होंने अपने साथी बंदियों को बताया कि हनुमान जी रामजी की हर आज्ञा का हमेशा पालन करते हैं। गांधी जी ने एक दूत भेजकर विनोबा जी का अनशन समाप्त कराया और उनसे इस बात का वादा भी करवाया कि वे अनशन नहीं करेंगे। इस तरह दृढ़ संकल्प से यह संघर्ष और मजबूत हुआ, हालांकि यह पूरी तरह मानवीय भी बना रहा।

भारत के समर्थन में भरपूर विश्व जनमत सामने आने लगा। अमेरिकी राष्ट्रपति फै्रंकलिन डी. रूजवेल्ट ने चर्चिल पर दबाव डाला कि वह भारत की मांग को स्वीकार कर लें। चर्चिल ने इस्तीफा देने का अपना तुरुप का पत्ता चलते हुए कहा कि वह भारत की मांग स्वीकार करने की बजाय त्यागपत्र दे देंगे। प्यारेलाल के शब्दों में : पांच साल से भी कम अरसे में अगस्त 1942 का विद्रोह का नारा ब्रिटिश सरकार की सरकारी कार्यसूची का हिस्सा बन गया और ‘भारत छोड़ो’ के नारे को ‘एशिया छोड़ो’ का नारा बनते ज्यादा देर नहीं लगी।’’ इस तरह भारत छोड़ो आंदोलन ने जहां भारत को आजादी दिलाई वहीं दुनिया को एक ऐसा अहिंसक तरीका दिया जिसे अत्यंत भयावह स्थितियों में भी अपनाया जा सकता है। उसी तरह की स्थिति जैसी भारत में 1942 में थी।

*लेखक डॉ. जॉन चेल्लादुरै गुजरात विद्यापीठ के विद्यार्थी रहे हैं और महाराष्ट्र में जलगांव स्थित गांधी रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने निजी विचार हैं।